बिलासपुर: चिकित्सा जगत में विश्वास का पर्याय माने जाने वाले कॉर्पोरेट अस्पतालों की साख पर छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में एक ऐसा दाग लगा है, जो आम जनता की रूह कंपा देने के लिए काफी है। सरकण्डा थाना क्षेत्र के अपोलो अस्पताल में ‘फर्जी डॉक्टर’ के हाथों इलाज और उसके बाद पुलिस की जांच में आई ‘क्लोजर रिपोर्ट’ ने कॉर्पोरेट हॉस्पिटल प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
क्या था पूरा मामला?
मामला वर्ष 2006 का है, जब डॉ. प्रदीप शुक्ला ने शिकायत की कि उनके पिता स्व. पं. राजेन्द्र प्रसाद शुक्ला का इलाज करने वाले तथाकथित कार्डियोलॉजिस्ट नरेन्द्र विक्रमादित्य यादव (उर्फ नरेन्द्र जॉन कैम) असल में डिग्रीधारी डॉक्टर थे ही नहीं। जांच में जो खुलासे हुए, वे हैरान करने वाले हैं:
- फर्जी पहचान का खेल: आरोपी ने अलग-अलग नामों से आधार और पैन कार्ड बनवा रखे थे।
- डिग्री का अता-पता नहीं: उत्तर बंगाल मेडिकल कॉलेज के रिकॉर्ड में आरोपी के नाम पर MBBS की कोई वैध डिग्री ही नहीं मिली।
- मौत का आंकड़ा: आरोपी ने जिस दौरान अस्पताल में कंसल्टेंट कार्डियोलॉजिस्ट के रूप में काम किया, उस अवधि में लगभग 27 मरीजों की उपचार के दौरान मृत्यु हुई।
पुलिस जांच: एक तरफ जेल, दूसरी तरफ ‘क्लीन चिट’
पुलिस ने इस मामले में कठोर रुख अपनाते हुए आरोपी डॉक्टर को तो गिरफ्तार कर न्यायालय में अभियोग पत्र (चार्जशीट) पेश कर दिया, लेकिन जब बात ‘अस्पताल प्रबंधन’ की आई, तो जांच की दिशा पूरी तरह बदल गई।
पुलिस ने धारा 173(8) के तहत प्रबंधन की भूमिका की जांच की, लेकिन अस्पताल प्रबंधन का बचाव का तर्क बेहद अजीब रहा। अस्पताल ने कहा कि:
- ”नियुक्ति 17-18 साल पुरानी है, इसलिए रिकॉर्ड अब उपलब्ध नहीं हैं।”
- ”अभिलेख या तो नष्ट हो गए या मिल नहीं रहे हैं।”
अस्पताल के इस ‘अंधेरे तर्क’ को आधार बनाकर जिला अभियोजन की राय के बाद पुलिस ने प्रबंधन और चयन समिति के खिलाफ साक्ष्य के अभाव में क्लोजर रिपोर्ट पेश कर दी है।
आम जनता के लिए ‘सोचनीय’ स्थिति: आखिर जिम्मेदारी किसकी?
यह घटना हर उस व्यक्ति के लिए चिंता का विषय है जो अपनी जान बचाने के लिए लाखों रुपये खर्च कर कॉर्पोरेट अस्पतालों की शरण में जाता है।
- क्या सिर्फ डॉक्टर जिम्मेदार है? सवाल यह है कि एक इतना बड़ा अस्पताल, जहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की भर्ती के लिए कड़े मापदंड होने चाहिए, वहां बिना डिग्री देखे किसी व्यक्ति को सीधे ‘कंसल्टेंट कार्डियोलॉजिस्ट’ कैसे नियुक्त कर दिया गया?
- सवालों के घेरे में ‘कॉर्पोरेट पारदर्शिता’: यदि अस्पताल का रिकॉर्ड 15-20 साल में ही “गायब” या “नष्ट” हो जाता है, तो मरीजों के साथ हुई लापरवाही का हिसाब कौन देगा?
- साक्ष्य का अभाव या प्रबंधन का प्रभाव? जिस अस्पताल में करोड़ों का टर्नओवर है, वहां क्या दस्तावेजों का इतना ही महत्व है कि एक फर्जी डॉक्टर की नियुक्ति का रिकॉर्ड तक नहीं मिलता?
लब्बोलुआब’ (संक्षिप्त और सटीक)
आरोपी डॉक्टर तो सलाखों के पीछे है, लेकिन इस केस की क्लोजर रिपोर्ट उन हजारों परिवारों के लिए एक बड़ा झटका है, जो आज भी अपने परिजनों की मौत के कारणों को लेकर जवाब मांग रहे हैं। यह मामला यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या कॉर्पोरेट अस्पताल केवल मुनाफे की मशीन बनकर रह गए हैं, जहां भर्ती के समय ली जाने वाली फीस तो पक्की होती है, लेकिन मरीजों की जान की सुरक्षा और डॉक्टर की योग्यता की गारंटी ‘रिकॉर्ड न होने’ के बहाने धूल में मिला दी जाती है?
बिलासपुर के जागरूक नागरिकों का कहना है कि पुलिस की यह क्लोजर रिपोर्ट कानून की खामियों की ओर इशारा करती है या फिर कहीं न कहीं कॉर्पोरेट दबाव की ओर? यह बड़ा यक्ष प्रश्न बना हुआ है।


