रायपुर/बिलासपुर: छत्तीसगढ़ में शिक्षा व्यवस्था को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है। बिलासपुर के पूर्व विधायक शैलेश पांडेय ने मौजूदा भाजपा सरकार पर शिक्षा के क्षेत्र में “झूठ बोलने और जनता को ठगने” का गंभीर आरोप लगाया है। पांडेय ने न केवल सरकार के चुनावी वादों की पोल खोली है, बल्कि ‘स्वामी आत्मानंद स्कूलों’ की उपेक्षा को लेकर भी तीखे प्रहार किए हैं।
’सांय-सांय’ झूठ बोलने का आरोप
पूर्व विधायक शैलेश पांडेय ने सरकार पर तंज कसते हुए कहा कि भाजपा की सरकार “सांय-सांय झूठ बोल रही है।” उन्होंने सरकार से सीधा सवाल पूछा:
- वादे का क्या हुआ? चुनाव के दौरान हर गांव में ‘कॉन्वेंट’ स्तर की शिक्षा और विवेकानंद के नाम पर स्कूल खोलने का बड़ा वादा किया गया था। पांडेय ने चुनौती देते हुए पूछा कि सरकार यह स्पष्ट करे कि अब तक प्रदेश के कितने विकासखंडों में ये स्कूल धरातल पर उतरे हैं?
- जमीनी हकीकत का दावा: पांडेय ने कहा कि जनता अब सब समझ रही है। वादे हवा-हवाई साबित हुए हैं और हकीकत यह है कि सरकार शिक्षा के नाम पर केवल भ्रम फैला रही है।
’आत्मानंद’ बनाम ‘विवेकानंद’ पर तनातनी
शैलेश पांडेय ने कांग्रेस कार्यकाल की सबसे सफल योजना ‘स्वामी आत्मानंद इंग्लिश मीडियम स्कूल’ को लेकर सरकार के रुख पर गहरा रोष जताया। उन्होंने कहा:
- ऐतिहासिक धरोहर की उपेक्षा: आत्मानंद स्कूलों ने हजारों गरीब बच्चों का भविष्य संवारा है। सरकार इसे आगे बढ़ाने के बजाय दुर्भावना के चलते बंद करने पर आमादा है।
- शिक्षा को पीछे धकेलने की साजिश: पूर्व विधायक का आरोप है कि पुरानी अच्छी योजनाओं को नेस्तनाबूद करके और नई योजनाओं का नाम लेकर केवल राजनीतिक श्रेय लेने का खेल खेला जा रहा है, जिसका खामियाजा प्रदेश के छात्र भुगत रहे हैं।
क्या कहता है सरकारी पक्ष? (तथ्यों की पड़ताल)
जहाँ एक ओर शैलेश पांडेय मुखर हैं, वहीं शिक्षा विभाग के आंकड़े कुछ और कहानी बयां करते हैं:
- बजट और योजना: सरकार ने शिक्षा विभाग के लिए वर्ष 2026-27 में 22,466 करोड़ रुपये का बड़ा बजट आवंटित किया है। इसमें ‘स्वामी विवेकानंद उत्कृष्ट विद्यालय’ के नाम से 150 मॉडल स्कूल खोलने के लिए 100 करोड़ का प्रावधान रखा गया है।
- अधिकारियों की कवायद: हाल ही में कोरिया और दुर्ग सहित कई जिलों में कलेक्टरों ने मॉडल स्कूलों के निरीक्षण और चयन की प्रक्रिया तेज कर दी है। सरकार का तर्क है कि वे आधुनिक सुविधाएं और बेहतर गुणवत्ता वाली शिक्षा देकर सरकारी स्कूलों को एक नई पहचान देना चाहते हैं।
विश्लेषण: क्या शिक्षा बन रही है राजनीतिक अखाड़ा?
शैलेश पांडेय जैसे वरिष्ठ नेताओं के आक्रामक तेवर बताते हैं कि शिक्षा का मुद्दा आने वाले दिनों में और गरमाने वाला है। विपक्ष जहां इसे “झूठ का पुलिंदा” बता रहा है, वहीं सरकार इसे “शिक्षा का आधुनिकीकरण” करार दे रही है।
इस राजनीतिक शोर के बीच, अभिभावकों और छात्रों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि क्या नई योजनाओं के नाम पर मौजूदा सफल शैक्षिक ढांचा कहीं ढह न जाए। प्रदेश की जनता अब यह देखना चाहती है कि क्या विवेकानंद स्कूल सचमुच आत्मानंद स्कूलों की तरह प्रभावी साबित होंगे या फिर ये केवल चुनावी कागजी वादों तक ही सीमित रहेंगे।


