भारत के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एन. वेंकटरमण द्वारा लिखे गए आलेख के मुख्य बिंदुओं के आधार पर इस महत्वपूर्ण विषय पर विस्तृत समाचार रिपोर्ट निम्नलिखित है:
- मूल समस्या का समाधान: न्यायाधिकरणों के कार्यकाल, सदस्यों की आयु या चयन समिति में सदस्यों की संख्या जैसे सतही मुद्दों पर ध्यान देने के बजाय, नया विधेयक न्यायाधिकरणों की संरचनात्मक स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता पर जोर देता है।
- राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग: कानून के तहत एक स्वतंत्र आयोग की स्थापना की जाएगी, जिसका कार्य चयन, निगरानी, अनुशासन और न्यायाधिकरणों की आवश्यकताओं का आकलन करना होगा।
न्यायिक सर्वोच्चता और संतुलन: आयोग की अध्यक्षता उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश या उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा की जाएगी, जिसमें न्यायिक बहुमत का प्रावधान है। साथ ही, यह कार्यपालिका और न्यायपालिका दोनों से समान दूरी बनाए रखते हुए संतुलन स्थापित करता है।
1. पृष्ठभूमि और चुनौतियाँ
सार्वजनिक अधिनियमों के इतिहास में न्यायाधिकरणों का गठन हमेशा से एक पेचीदा विषय रहा है। वर्ष 1987 के ‘एस. पी. संपत कुमार मामले’ से लेकर नवंबर 2025 के ‘मद्रास बार एसोसिएशन’ से संबंधित निर्णय तक, अदालतों ने बार-बार कानून निरस्त किए और नए निर्देश जारी किए। इस चक्र ने यह साबित किया कि न्यायाधिकरणों की कार्यप्रणाली को लेकर समस्या कितनी गहरी थी।
लेख के अनुसार, कार्यकाल (3, 4 या 5 वर्ष), न्यूनतम आयु सीमा (50 वर्ष) या चयन समिति में नामों की संख्या जैसी बातें मूल समस्या का समाधान नहीं थीं, बल्कि ये केवल बीमारी के लक्षण मात्र थीं। असली समस्या यह थी कि न्यायाधिकरणों को अपने दैनिक कार्यों के लिए कार्यपालिका पर निर्भर रहना पड़ता था।
2. वैश्विक अनुभव और ब्रिटेन का मॉडल
ब्रिटेन में 2001 में सर एंड्रयू लेगट की समीक्षा में यह पाया गया था कि न्यायाधिकरणों का प्रशासन उन्हीं विभागों द्वारा किया जाता था जिनके निर्णयों की वे समीक्षा करते हैं। इस मूल दोष को दूर करने के लिए ब्रिटेन ने 2007 के अधिनियम के तहत न्यायाधिकरणों को उनके प्रायोजक विभागों से अलग कर एक एकल सेवा के अधीन किया। भारत में भी आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (1941) जैसे संस्थान सफल रहे हैं, लेकिन स्वतंत्रता को पूरी तरह सुनिश्चित करने के लिए संरचनात्मक बदलाव जरूरी थे।
3. न्यायाधिकरण सुधार विधेयक, 2026 की प्रमुख विशेषताएं
- राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग की स्थापना: इस नए विधेयक के तहत एक मजबूत संस्था का गठन किया जाएगा जिसका अस्तित्व और कार्य किसी कार्यपालिका आदेश से नहीं, बल्कि सीधे कानून (अधिनियम) से संचालित होंगे।
- स्थायी पेशेवर सचिवालय: आयोग के चारों ओर एक स्थायी सचिवालय स्थापित किया जाएगा, जो पात्रता की जांच करेगा और पूरी प्रक्रिया का पारदर्शी रिकॉर्ड रखेगा।
- नेतृत्व और न्यायिक सर्वोच्चता: आयोग और चयन समितियों की अध्यक्षता न्यायिक अधिकारियों द्वारा की जाएगी। चूंकि कार्यपालिका इस प्रक्रिया में सबसे बड़ी वादी है, इसलिए यह व्यवस्था सुनिश्चित करती है कि वादी पक्ष खुद न्यायधीशों के चयन में हावी न हो।
- नियंत्रण और संतुलन (Checks and Balances): यह विधेयक न्यायाधिकरण को कार्यपालिका और न्यायपालिका दोनों से समान दूरी पर रखता है। केंद्र सरकार नियम बनाती है, आयोग विनियम तय करता है और सचिवालय परिचालन संभालता है, जिससे किसी एक पक्ष के हाथ में पूरा नियंत्रण नहीं जाता।
4. भविष्य की दिशा और निष्कर्ष
कनाडा द्वारा 2014 में अपनाए गए मॉडल की तर्ज पर यह विधेयक प्रशासनिक और न्यायनिर्णयन की स्वतंत्रता के बीच एक नाज़ुक संतुलन बनाता है। यदि यह अपने निर्धारित स्वरूप में लागू होता है, तो इससे न्यायाधिकरणों में समय पर रिक्तियां भरने, जवाबदेही तय होने और वादी को एक निष्पक्ष एवं सक्षम मंच मिलने का मार्ग प्रशस्त होगा।



