सीपत: सीपत थाना क्षेत्र के ग्राम धनिया में दिनदहाड़े हुई हिंसा ने कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सीपत प्रेस क्लब के उपाध्यक्ष और किसान कोमल पाटनवार पर खेत के कब्जे को लेकर हुए विवाद में जानलेवा हमला किया गया। धारदार चाकू और रापा (कृषि औजार) से किए गए इस बर्बर हमले में पीड़ित पत्रकार बुरी तरह घायल हो गया है, लेकिन पुलिस द्वारा दर्ज की गई धाराओं ने स्थानीय पत्रकारों और ग्रामीणों में भारी आक्रोश भर दिया है।
क्या है पूरा मामला?
पीड़ित कोमल पाटनवार पिछले तीन वर्षों से लालजी पाटनवार की जमीन पर बटाई (अधिया) पर खेती कर रहे हैं। 11 जुलाई 2026 की शाम जब वे अपने खेत पर पहुंचे, तो उन्होंने पाया कि गोपाल पाटनवार और माधव पाटनवार अवैध रूप से ट्रैक्टर से जुताई कर रहे हैं। जब कोमल ने इसका विरोध किया, तो आरोपियों ने न केवल गाली-गलौज की, बल्कि जान से मारने की धमकी देते हुए उन पर प्राणघातक हमला कर दिया। हमलावरों ने चाकू से उनके बाएं हाथ की उंगलियों और पीठ पर वार किए, जबकि रापा से पैर पर गंभीर चोटें पहुंचाईं।
पुलिस की ‘मेहरबानी’ पर उठे सवाल
सीपत पुलिस ने इस गंभीर मामले में गोपाल प्रसाद पाटनवार और माधव पाटनवार के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 115(2), 296, 351(3) और 3(5) के तहत मामला तो दर्ज कर लिया है, लेकिन पत्रकारों का गुस्सा इस बात पर है कि पुलिस ने जानलेवा हमले के बावजूद इसमें ‘गैर-जमानती’ (Non-bailable) कठोर धाराओं का समावेश करने से परहेज किया है।
सीपत के पत्रकारों का कहना है कि:
- धाराओं का खेल: एक सार्वजनिक प्रतिनिधि और पत्रकार पर धारदार हथियार से हमला करने के बावजूद मामूली धाराओं का उपयोग आरोपियों को संरक्षण देने जैसा है।
- निष्पक्षता पर संदेह: घटना के बाद दूसरे पक्ष द्वारा की गई शिकायत पर भी एफआईआर दर्ज करना पुलिस की सोची-समझी रणनीति लग रही है ताकि मूल मुद्दे को भटकाया जा सके।
- कड़ी कार्रवाई की मांग: पीड़ित कोमल पाटनवार की गंभीर चोटों और हमले की प्रकृति को देखते हुए पत्रकारों ने स्पष्ट मांग की है कि आरोपियों पर तुरंत कठोरतम गैर-जमानती धाराएं जोड़ी जाएं और उन्हें तत्काल गिरफ्तार किया जाए।
जांच के नाम पर खानापूर्ति?
पुलिस का रटा-रटाया बयान है कि “मामले की जांच जारी है और साक्ष्यों के आधार पर कार्रवाई होगी।” लेकिन सवाल यह है कि जब साक्षात चाकू और रापा से हुए घाव मौजूद हैं, तो पुलिस किस ‘साक्ष्य’ के इंतजार में आरोपियों पर नरमी बरत रही है?
इस घटना ने साबित कर दिया है कि सीपत में अब पत्रकारों और आम नागरिकों की सुरक्षा खतरे में है। यदि प्रशासन ने जल्द ही आरोपियों को सलाखों के पीछे नहीं भेजा और धाराओं में सुधार नहीं किया, तो सीपत के पत्रकार उग्र आंदोलन के लिए मजबूर होंगे।


