क्राइमबिलासपुर

सर्पदंश मुआवजा घोटाला: मर्चुरी से लेकर एसडीएम-तहसीलदार की कुर्सी तक, कौन-कौन है इस लूट का हिस्सेदार?

​बिलासपुर में सर्पदंश मृत्यु मुआवजा घोटाला अब एक ऐसे संगठित गिरोह का पर्दाफाश बन चुका है, जिसमें निचले स्तर के मोर्चरी के सिपाहियों और बाबुओं से लेकर राजस्व तंत्र के बड़े अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। पुलिस की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, यह साफ होता जा रहा है कि बिना प्रशासनिक संरक्षण और अधिकारियों की मिलीभगत के सरकारी खजाने से लाखों रुपये का यह फर्जीवाड़ा संभव ही नहीं था।

​‘रक्षक’ बने मुखबिर और दलालों का नेटवर्क

​इस पूरे सिंडिकेट की शुरुआत अस्पताल की मोर्चरी से होती थी:

  • ​सिपाहियों की भूमिका: सिम्स पुलिस चौकी में तैनात सिपाही रामकुमार पाटनवार और रामेश्वर भास्कर मास्टरमाइंड हीरा खांडेकर के गिरोह के लिए ‘सूचना एजेंट’ का काम करते थे। पोस्टमार्टम के लिए आने वाले हर शव की खबर वे तुरंत गिरोह के सदस्यों तक पहुंचाते थे।
  • ​दलालों का जाल: गिरोह के सदस्य अस्पताल पहुंचकर शोक संतप्त परिजनों को शासन की आपदा राहत राशि का लालच देते थे और मौत का कारण ‘सर्पदंश’ बताने के लिए राजी करते थे। इस पूरी प्रक्रिया में ड्राइवर गोविंद विश्वकर्मा और अन्य के खातों में संदिग्ध लेनदेन की बात सामने आ चुकी है, जिसके बाद पुलिस अब तक 13 लोगों को गिरफ्तार कर चुकी है।

​लिपिकों की गिरफ्तारी पर घमासान: क्या बाबू ही हैं असली गुनहगार?

​बिलासपुर तहसील के तीन राजस्व कर्मचारियों (नरेंद्र कुमार कौशिक, हरिशंकर राठौर और गरीबराम बिंझवार) की गिरफ्तारी के बाद लिपिक वर्गीय शासकीय कर्मचारी संघ ने तीखा विरोध दर्ज कराया है। संघ का सवाल बिल्कुल स्पष्ट है—जब कानूनन फाइलें बाबुओं के रास्ते से होकर ऊपर जाती हैं, तो क्या बाबू सिर्फ आदेश का पालन करने के लिए जेल जाएंगे और बड़े अफसर बच निकलेंगे?

​आरआई, तहसीलदार और एसडीएम की भूमिका पर सबसे बड़े सवाल

​राजस्व पुस्तक परिपत्र (आरबीसी 6-4) के नियमों के मुताबिक, मुआवजा राशि स्वीकृत करने की एक लंबी और कड़े वैधानिक परीक्षण की प्रक्रिया होती है:

    1. ​पंचनामा और पोस्टमार्टम: पुलिस मौके का पंचनामा और डॉक्टर पोस्टमार्टम रिपोर्ट तैयार करते हैं।
    2. ​हल्का पटवारी की जांच: इसके बाद हल्का पटवारी मैदानी जांच कर अपना प्रतिवेदन तैयार करता है।
    3. ​राजस्व निरीक्षक (आरआई) और नायब तहसीलदार का परीक्षण: फाइल आरआई और नायब तहसीलदार के पास जाती है, जो दस्तावेजों की सत्यता की जांच करते हैं।
    4. ​अंतिम स्वीकृति (एसडीएम / तहसीलदार): मुआवजे की फाइल पर अंतिम निर्णय लेने और मोहर लगाने का वैधानिक अधिकार केवल सक्षम प्राधिकारी यानी तहसीलदार या एसडीएम के पास होता है।

​सबसे बड़ा षडयंत्र और सवाल:

जब बिना आरआई की रिपोर्ट, नायब तहसीलदार के परीक्षण और तहसीलदार या एसडीएम के हस्ताक्षर व प्रशासनिक स्वीकृति के एक भी रुपये का मुआवजा जारी नहीं हो सकता, तो फिर पुलिस अब तक उन बड़े अधिकारियों तक क्यों नहीं पहुँची? क्या आरआई, तहसीलदार और एसडीएम को इस पूरे खेल की भनक नहीं थी, या फिर उनके दस्तखत के पीछे कोई बड़ा प्रशासनिक षडयंत्र छिपा है?

 

​फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट तैयार करने वाले फरार डॉक्टर और अब उन सफेदपोशों की तलाश तेज हो गई है, जिनके कलम से इस अवैध मुआवजे की फाइल पर हरी झंडी दिखाई गई थी।

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