कोरबा (छत्तीसगढ़): मनोज वर्मा
आवास और शहरी कार्य मंत्रालय (MoHUA) की प्रमुख पहल ‘कैच द रेन’ (अमृत 2.0) के तहत जल संरक्षण और भूजल पुनर्भरण के क्षेत्र में छत्तीसगढ़ का औद्योगिक हब कोरबा एक विशिष्ट राष्ट्रीय मॉडल बनकर उभरा है। हसदेव नदी के तट पर स्थित और अपने कोयला खनन व थर्मल पावर इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए प्रसिद्ध यह शहर, कभी शुष्क मौसम में गंभीर जल संकट से जूझता था। लेकिन अब आधुनिक तकनीकों और बेहतरीन प्रशासनिक रणनीतियों के दम पर यहां जल संकट से निपटने में बड़ी सफलता मिली है।
- इसरो (ISRO) मैपिंग और शैलो एक्विफर मैनेजमेंट (SAM): भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (NRSC) की मदद से शहर के 10 अति-संवेदनशील स्थलों की पहचान की गई, जहां भूजल स्तर काफी नीचे चला गया था। इन स्थानों पर शैलो एक्विफर मैनेजमेंट (SAM) प्रणालियां स्थापित की गईं, जिनमें मल्टी-स्टेज डिसिल्टेशन यूनिट्स (गाद छानने की तकनीक) और डायरेक्ट इंजेक्शन रीचार्ज वेल्स शामिल हैं।
- भूजल स्तर में भारी सुधार: जिला प्रशासन के अनुसार, इन वैज्ञानिक प्रयासों से भूजल स्तर में अभूतपूर्व सुधार हुआ है। जिन क्षेत्रों में पानी के लिए 600 मीटर तक गहराई में जाना पड़ता था, वहां अब मात्र 150 मीटर की गहराई पर पानी उपलब्ध हो रहा है।
- बोरवेलों और छतों का संचयन: नगर निगम द्वारा शहर भर में 109 रूफटॉप रेन वॉटर हार्वेस्टिंग प्लांट और 95 बंद पड़े बोरवेलों को सक्रिय रीचार्ज शाफ्ट के रूप में पुनर्जीवित करने का कार्य तेजी से किया जा रहा है। जिला कलेक्टर श्री कुणाल दुदावत के नेतृत्व में इस वर्ष 20,000 जल संरक्षण संरचनाएं तैयार करने का लक्ष्य रखा गया है।
- एनटीपीसी के साथ ₹111 करोड़ की ऐतिहासिक साझेदारी: कोरबा शहर से गुजरने वाले 11 प्रदूषित नालों के उपचार और सर्कुलर इकोनॉमी को बढ़ावा देने के लिए एनटीपीसी के सहयोग से ₹111 करोड़ की अपशिष्ट जल उपचार परियोजना पर काम चल रहा है। वर्ष 2027 तक पूरी होने वाली इस परियोजना के तहत उपचारित पानी औद्योगिक उपयोग के लिए एनटीपीसी को बेचा जाएगा, जिससे स्थानीय नदियों पर ताजे पानी का दबाव पूरी तरह खत्म हो जाएगा।


