बिलासपुर (छत्तीसगढ़): कर्तव्य की वेदी पर अपनी पूरी निष्ठा झोंक देने वाले सरकंडा थाने के आरक्षक सत्या पाटले अब हमारे बीच नहीं रहे। बिलासपुर के श्रीराम केयर हॉस्पिटल में इलाज के दौरान उनकी मृत्यु के बाद शहर से लेकर उनके पैतृक गाँव एरमशाही तक मातम पसरा हुआ है। जहाँ एक ओर विभाग ने अपना एक हीरा खो दिया है, वहीं परिजनों ने अस्पताल प्रबंधन पर ‘इलाज में कोताही’ बरतने के गंभीर आरोप लगाते हुए न्याय की गुहार लगाई है।
अस्पताल बना अखाड़ा: लापरवाही या कुदरत का खेल?
परिजनों का सीधा आरोप है कि सत्या की जान बचाई जा सकती थी, लेकिन श्रीराम केयर हॉस्पिटल के डॉक्टरों ने इलाज में लापरवाही बरती। मौत के बाद अस्पताल परिसर में तनाव की स्थिति बनी रही। हालांकि, अस्पताल प्रबंधन ने अपना बचाव करते हुए आधिकारिक बयान जारी किया है कि आरक्षक की मृत्यु का कारण ‘मैसिव कार्डियक अरेस्ट’ (हार्ट अटैक) था और उन्होंने बचाने की पूरी कोशिश की थी।
एक स्तंभ जो ढह गया: परिवार का इकलौता सहारा
सत्या पाटले महज एक पुलिसकर्मी नहीं, बल्कि अपने विशाल परिवार की रीढ़ थे। तीन भाइयों और चार बहनों के बीच उन्होंने हमेशा एक अभिभावक की तरह परिवार का संचालन किया। उनकी असमय विदाई ने उनकी पत्नी और मासूम बच्चों (एक बेटा, एक बेटी) के सिर से साया छीन लिया है।
2013 बैच का ‘वो’ मिलनसार चेहरा
वर्ष 2013 में पुलिस विभाग का हिस्सा बने सत्या पाटले ने अपने 13 साल के करियर में अमिट छाप छोड़ी। सरकंडा थाने के उनके सहकर्मियों की आँखें आज नम हैं। उनका हंसमुख स्वभाव और जनता की मदद के लिए हमेशा तत्पर रहना उन्हें दूसरों से अलग बनाता था।
एरमशाही गाँव पर टूटा दुखों का दोहरा पहाड़
मस्तूरी विधानसभा का ग्राम एरमशाही आज सिसक रहा है। इसी गाँव ने कुछ समय पहले ही अपने एक और लाल, जवान संदीप कुर्रे को तिफरा ओवरब्रिज हादसे में खोया था। एक ही परिवार से जुड़े इन दो जवानों की अकाल मृत्यु ने पूरे मस्तूरी क्षेत्र को झकझोर कर रख दिया है।
संपादकीय टिप्पणी: “सत्या पाटले जैसे अनुशासित आरक्षक का जाना न केवल पुलिस विभाग बल्कि समाज के लिए भी बड़ी क्षति है। क्या अस्पतालों की कार्यप्रणाली पर उठते सवाल महज़ आरोप हैं या इनमें कोई कड़वी सच्चाई भी छिपी है? इसकी निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए।”

