बिलासपुर/सीपत
बिलासपुर जिले के मस्तूरी ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले सीपत क्षेत्र में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) का तंत्र पूरी तरह से संवेदनशून्यता और तानाशाही की भेंट चढ़ चुका है। एक तरफ शासन के नुमाइंदे गरीबों को खाद्य सुरक्षा देने के दावे करते हैं, वहीं दूसरी तरफ मस्तूरी के खाद्य अधिकारियों के कथित मनमाने आदेशों और सीपत क्षेत्र की उचित मूल्य की दुकानों (सोसायटियों) की मनमानी ने जनता का जीना मुहाल कर दिया है। हालात यह हैं कि अब सीपत क्षेत्र में ओटीपी सिस्टम से भी चावल व अन्य सामग्री देने पर रोक लगा दी गई है, जिससे गरीब, वृद्ध और दिव्यांग परिवार भूखों मरने की कगार पर पहुंच गए हैं।
1. ओटीपी सिस्टम बंद: जनता के हक पर सीधा डाका
सीपत क्षेत्र की सोसायटियों में इन दिनों अजीबोगरीब और अमानवीय फरमान चल रहे हैं। खाद्य विभाग के इशारों पर समिति संचालकों ने साफ कह दिया है कि अब किसी भी उपभोक्ता को ओटीपी के माध्यम से भी राशन नहीं दिया जाएगा। जिन उपभोक्ताओं के फिंगरप्रिंट तकनीकी कारणों से मैच नहीं होते या जिन्हें ओटीपी आधारित सत्यापन की राहत मिलती थी, उनके रास्ते भी पूरी तरह बंद कर दिए गए हैं।
2. ‘रायपुर परमिशन’ का बहाना और नामनी का पेच
जो वृद्ध, बीमार या दिव्यांगजन चलने-फिरने में असमर्थ हैं और समिति तक नहीं पहुंच पा रहे हैं, वे अपने स्थान पर किसी परिजन या परिचित को ‘नामनी’ (Nominee) बनाकर राशन उठाना चाहते हैं। लेकिन सीपत क्षेत्र की सोसायटियों के संचालक उन्हें और ज्यादा प्रताड़ित कर रहे हैं। संचालकों द्वारा सरेआम यह कहकर लौटाया जा रहा है कि “नामनी जोड़ने के लिए रायपुर से परमिशन लेनी पड़ेगी।” सवाल यह उठता है कि क्या स्थानीय स्तर पर आसानी से होने वाले प्रशासनिक कार्यों के लिए अब गरीबों को राज्य की राजधानी रायपुर के चक्कर काटने होंगे, या यह सोसायटियों और भ्रष्ट तंत्र की सोची-समझी कालाबाजारी का हिस्सा है?
3. खाद्य अधिकारी की शर्मनाक उदासीनता और मुकदर्शक रवैया
इस पूरे प्रशासनिक भ्रष्टाचार और जनता की लूट पर मस्तूरी ब्लॉक के खाद्य अधिकारी पूरी तरह से मूकदर्शक बने हुए हैं। उन्हें गरीबों के दर्द से कोई लेना-देना नहीं है। स्थिति यह है कि:
- क्षेत्र के जनप्रतिनिधि और जरूरतमंद ग्रामीण जब अपनी पीड़ा लेकर संपर्क करना चाहते हैं, तो खाद्य अधिकारी किसी का फोन तक रिसीव नहीं करते।
- मैदानी स्तर पर जाकर सोसायटियों, राइस मिलों और स्टॉक की जांच करना तो दूर, दफ्तर में बैठकर एसी की हवा खाने वाले इन अधिकारियों ने अपनी जवाबदेही पूरी तरह ताक पर रख दी है।
- राइस मिलों की अनियंत्रित जांच और सोसायटियों में कोटे की हेराफेरी पर पर्दा डालने का काम इन्हीं की शह पर हो रहा है।
- जिले के खाद्य नियंत्रक अमृत कुजूर से भी उनके पक्ष जानने का प्रयास किया गया लेकिन उन्होंने भी इस विषय में बात करना मुनासिब समझा ।
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जो वृद्ध या विकलांग सोसायटी तक नहीं पहुंच पाते उन्हें ओटीपी सिस्टम से राशन मिलना चाहिए । खाद्य अधिकारियों को किसी भी प्रकार की लापरवाही नहीं करनी चाहिए ।
दिलीप लहरिया विधायक मस्तूरी
तथ्यात्मक और प्रशासनिक सवाल (जिन्हें जनता के सामने लाना अनिवार्य है)
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- किस नियम के तहत सीपत क्षेत्र में ओटीपी सिस्टम से राशन वितरण बंद किया गया है? क्या यह मस्तूरी के खाद्य अधिकारी का कोई निजी तुगलकी फरमान है?
- छत्तीसगढ़ PDS नियंत्रण आदेश के तहत क्या स्थानीय स्तर पर नामनी जोड़ने का अधिकार सोसायटियों के पास नहीं है, या ‘रायपुर परमिशन’ का यह शिगूफा केवल खाद्यान्न में गोलमाल करने का बहाना है?
- एक जिम्मेदार पद पर बैठकर जनप्रतिनिधियों और मीडिया के फोन तक न उठाने वाले मस्तूरी ब्लॉक के खाद्य अधिकारी पर जिला प्रशासन कब तक विभागीय गाज गिराएगा?
सीपत क्षेत्र में खाद्य विभाग की यह कार्यशैली किसी बड़े घोटाले की ओर इशारा करती है। यदि जिला प्रशासन ने तत्काल हस्तक्षेप कर इस तानाशाही व्यवस्था को दुरुस्त नहीं किया और मस्तूरी के लापरवाह खाद्य अधिकारी व मनमानी करने वाले समिति संचालकों पर सख्त कार्रवाई नहीं की, तो जनता का आक्रोश सड़कों पर फूटना लाजिमी है।



