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मर्डर मिस्ट्री या खूनी खेल? NTPC और RVPR ठेका कंपनी की ‘जुगलबंदी’ पर उठे सवाल; अमृतांशु की मौत ने खोली तानाशाही की पोल!

सीपत। NTPC सीपत के भीतर एमजीआर रेल लाइन पर बिहार के होनहार युवक अमृतांशु सिंह की संदेहास्पद मौत ने इस औद्योगिक गढ़ के भीतर चल रहे ‘काले कारनामों’ और तानाशाही को पूरी तरह नंगा कर दिया है। स्टेज-3 निर्माण कार्य का ठेका लेकर बैठी मेसर्स आरवीपीआर (RVPR) एजेंसी और NTPC प्रबंधन की इस मामले पर जो ‘खतरनाक चुप्पी’ है, उसने साफ कर दिया है कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है!

​एक गरीब घर का पढ़ा-लिखा युवा, जो नौकरी करने आया था, उसकी लाश पटरियों पर ‘सजाकर’ रख दी जाती है और दोनों रसूखदार संस्थान शुतुरमुर्ग की तरह आंखें बंद किए बैठे हैं।

​ठेका कंपनी ‘RVPR’ के रहमों-करम पर कर्मचारी? सुरक्षा और अधिकारों का कत्लेआम!

​NTPC के भीतर काम करने वाली बाहरी ठेका कंपनियां अक्सर अपने फायदे के लिए स्थानीय और प्रवासी मजदूरों का खून चूसने के लिए बदनाम हैं। सूत्रों की मानें तो मेसर्स आरवीपीआर (RVPR) एजेंसी के भीतर भी अंदरूनी तौर पर भारी अनियमितताएं और मानसिक उत्पीड़न का खेल चल रहा था।

​कंपनी से जुड़े बड़े सवाल:

  • ​क्या अमृतांशु पर था कोई भारी दबाव? स्टेज-3 निर्माण कार्य के नाम पर इस ठेका कंपनी के अधिकारी अमृतांशु से ऐसा क्या काम करा रहे थे या किस बात का दबाव बना रहे थे कि उसकी संदिग्ध लाश मिली?
  • ​सुरक्षा प्रोटोकॉल की धज्जियां: NTPC जैसे हाई-सिक्योरिटी ज़ोन में कोई कर्मचारी ट्रैक पर आ जाता है और ठेका कंपनी के सुपरवाइज़रों को भनक तक नहीं लगती? या फिर सच को छुपाने के लिए जानबूझकर लापरवाही का नाटक किया जा रहा है?

​NTPC प्रबंधन का ‘सफेदपोश’ चेहरा और PRO विभाग की कायरता!

​जैसे ही यह खौफनाक घटना घटी, NTPC का पूरा प्रशासनिक और जनसंपर्क (PRO) अमला मामले को दबाने में जुट गया। अपनी साख बचाने के लिए और ठेका कंपनी के साथ अपनी ‘परदे के पीछे की पार्टनरशिप’ को छुपाने के लिए, इस मौत को सीधे ‘आत्महत्या’ का जामा पहनाने की घटिया कोशिश की जा रही है।

​सीधा आरोप: आखिर NTPC प्रबंधन को किस बात का डर है? अगर वे पाक-साफ हैं, तो घटना के तुरंत बाद आरवीपीआर (RVPR) कंपनी के बड़े अधिकारियों पर एफआईआर दर्ज कराने या उन्हें ब्लैकलिस्ट करने की हिम्मत क्यों नहीं दिखाई? यह चुप्पी सीधे तौर पर सह-अपराधी होने का सबूत दे रही है!

 

​5 से 10 की स्पीड में ‘क्राइम सीन’ मैनेज: यह अंधा कानून नहीं चलेगा!

​जिस ट्रैक पर कोयला गाड़ियां रेंगते हुए (5-10 किमी/घंटा) चलती हैं, वहां कोई इंसान कट जाए और ड्राइवर को पता न चले, यह थ्योरी सीपत की जनता के गले नहीं उतर रही है।

​तस्वीरें चीख-चीख कर कह रही हैं कि अमृतांशु का शव जिस ‘पॉइंट’ पर सलीके से लिटाया गया था, वह किसी पेशेवर अपराधी का काम लगता है। शक की सुई सीधे तौर पर ठेका कंपनी के रसूखदारों और NTPC के भ्रष्ट सुरक्षा तंत्र की मिलीभगत पर टिकती है, जिन्होंने मिलकर इस ‘मर्डर’ को ‘सुसाइड’ की शक्ल देने की कोशिश की।

​खौफ के साए में सह-कर्मचारी: सच बोला तो नौकरी से धोओगे हाथ!

​अमृतांशु की मौत के बाद प्लांट के भीतर बाकी कर्मचारियों में दहशत का माहौल है। ठेका कंपनी और NTPC प्रबंधन द्वारा अंदरूनी तौर पर यह फरमान जारी कर दिया गया है कि कोई भी मुंह न खोले। सच बोलने वालों को सीधे ‘नौकरी से निकालने’ और ‘फंसाने’ की धमकी दी जा रही है। मजदूरों के खून पसीने पर ऐश करने वाले इन ‘सफेदपोशों’ ने न्याय की आवाज को दबाने के लिए तानाशाही का सहारा ले लिया है।

​सीपत पुलिस की अग्निपरीक्षा: क्या ‘पॉवर और पैसे’ के आगे झुकेगा कानून?

​अब गेंद सीपत पुलिस के पाले में है। एक तरफ अरबों की सरकारी महारत्न कंपनी NTPC और भारी-भरकम ठेका कंपनी का राजनीतिक व आर्थिक दबाव है, तो दूसरी तरफ एक बेकसूर मृतक के बूढ़े पिता (धनंजय सिंह) के आंसू।

​अगर पुलिस ने तत्काल CISF के सीसीटीवी फुटेज, RVPR कंपनी के अधिकारियों की कॉल डिटेल (CDR) और ट्रेन ड्राइवर की लॉग बुक को जब्त कर कड़ी पूछताछ नहीं की, तो जनता का कानून व्यवस्था से भरोसा उठ जाएगा। सीपत की आक्रोशित जनता अब चुप बैठने वाली नहीं है—न्याय मिलने तक यह लड़ाई जारी रहेगी!

मनोज वर्मा ,पूर्व अध्यक्ष ( इंटक )

एनटीपीसी सीपत के एमजीआर रेल लाइन में सीआईएसएफ द्वारा दिनांक 21.05.2026 को सुबह लगभग 11:45 बजे एक अज्ञात शव पाया गया। जिसकी सूचना पुलिस को तत्काल दी गई। शव को देखकर प्रथम दृष्टया यह आत्महत्या का मामला प्रतीत होता है। पुलिस की उपस्थिति में जाँच के पश्चात अज्ञात शव तथा मृत्यु के कारण के बारे में विस्तृत जानकारी दी जाएगी।

प्रवीण रंजन भारती
जन संपर्क अधिकारी
एनटीपीसी सीपत

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