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बिलासपुर में ‘छात्रों की गूंज’: सिस्टम के ‘लीक’ होते भरोसे और सड़कों पर उतरता युवा आक्रोश

बिलासपुर | छत्तीसगढ़ की शिक्षा व्यवस्था इन दिनों एक गहरे संकट के दौर से गुजर रही है। बिलासपुर में आयोजित “छात्रों की गूंज” कार्यक्रम इस बात का प्रमाण है कि प्रदेश का युवा अब महज मूकदर्शक नहीं रहेगा। कांग्रेस अल्पसंख्यक विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष इमरान प्रतापगढ़ी और जिला कांग्रेस (ग्रामीण) अध्यक्ष महेंद्र गंगोत्री ने इस मंच से न केवल सरकार की नीतियों की आलोचना की, बल्कि आंकड़ों के माध्यम से उस ‘भ्रष्ट तंत्र’ को भी बेनकाब किया जो युवाओं के भविष्य को दीमक की तरह चाट रहा है।

​आंकड़ों की सच्चाई: क्या वाकई ‘पारदर्शिता’ है?

​राज्य सरकार ने हाल ही में ‘लोक भर्ती एवं व्यावसायिक परीक्षाओं में अनुचित साधनों की रोकथाम विधेयक-2026’ पारित किया है, जिसमें पेपर लीक और नकल पर 10 साल तक की जेल का प्रावधान है। लेकिन सवाल यह है कि—कानून बनने के बाद भी धरातल पर सुधार क्यों नहीं है?

  • ​विफल दावों का सच: प्रदेश में पिछले कुछ समय में कई प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताओं के आरोपों ने छात्रों का मनोबल तोड़ दिया है। एक ओर सरकार ‘पारदर्शी भर्ती’ का दावा करती है, तो दूसरी ओर आए दिन किसी न किसी परीक्षा के ‘री-एग्जाम’ (पुनः परीक्षा) की नौबत आ रही है।
  • ​आर्थिक बोझ और मानसिक प्रताड़ना: बिलासपुर, जो शिक्षा का केंद्र है, वहां के छात्रों का कहना है कि एक परीक्षा के लिए फॉर्म भरने से लेकर परीक्षा तक का खर्च औसतन 5,000 से 10,000 रुपये तक आता है। बार-बार पेपर लीक और परीक्षाओं के रद्द होने से गरीब और मध्यमवर्गीय ग्रामीण छात्रों पर आर्थिक बोझ असहनीय हो गया है।

​इमरान प्रतापगढ़ी: संसद से सड़क तक की ‘वैचारिक हुंकार’

​राष्ट्रीय अध्यक्ष इमरान प्रतापगढ़ी ने अपनी स्पष्टवादिता से इस आंदोलन को नई ऊंचाई दी। उन्होंने कहा:

​“अगर छत्तीसगढ़ के युवाओं के हक पर डाका डाला जाएगा, तो यह आवाज केवल बिलासपुर के होटल के कमरों तक सीमित नहीं रहेगी। मैं इस मुद्दे को संसद की दहलीज तक ले जाऊंगा। पेपर लीक का अर्थ केवल एक प्रश्नपत्र का बाहर आना नहीं, बल्कि उस अभ्यर्थी की मेहनत का कत्ल है जो एक कमरे में बैठकर अपनी पूरी जिंदगी परीक्षा के लिए लगा देता है।”

 

​प्रतापगढ़ी का यह तेवर बताता है कि कांग्रेस इस मुद्दे को ‘इलेक्शन एजेंडा’ (Election Agenda) नहीं, बल्कि एक ‘सोशल मूवमेंट’ (Social Movement) के रूप में देख रही है।

​महेंद्र गंगोत्री का आक्रामक नेतृत्व: ग्रामीण युवाओं की ‘रीढ़’

​जिला कांग्रेस (ग्रामीण) अध्यक्ष महेंद्र गंगोत्री का इस पूरे प्रकरण में योगदान केवल मंच साझा करने तक सीमित नहीं है। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में एक व्यापक नेटवर्क तैयार किया है। गंगोत्री की रणनीति स्पष्ट है—‘आंदोलन का विकेंद्रीकरण’।

  • ​जमीनी लामबंदी: महेंद्र गंगोत्री ने जिले के प्रत्येक ब्लॉक में ‘छात्र प्रकोष्ठ’ को सक्रिय कर दिया है। उनका तर्क है कि जब तक गांव का अंतिम छात्र सिस्टम के खिलाफ जागरूक नहीं होगा, तब तक बड़े ‘शिक्षा माफिया’ नहीं डरेंगे।
  • ​सीधी चुनौती: गंगोत्री ने सरकार को चेतावनी दी है कि यदि नए कानून के तहत पेपर लीक करने वाले बड़े ‘माफियाओं’ पर कार्रवाई नहीं हुई, तो वे जिला कार्यालय से लेकर विधानसभा तक घेराव करने से पीछे नहीं हटेंगे।

​समीक्षा: क्या ‘सिस्टम’ सुधरेगा?

​इमरान प्रतापगढ़ी की राष्ट्रीय मुखरता और महेंद्र गंगोत्री की जमीनी सक्रियता का मेल बिलासपुर के युवाओं के लिए एक संजीवनी की तरह है। छत्तीसगढ़ का वर्तमान परिदृश्य यह संकेत दे रहा है कि यदि सरकार ने केवल ‘विधेयक’ (Bill) पास करने तक सीमित रहकर ‘कार्रवाई’ (Action) में कोताही बरती, तो छात्रों का यह असंतोष एक ऐसे जनांदोलन में बदलेगा जिसे रोकना सत्ता के लिए मुश्किल होगा।

​छात्र अब आंकड़ों की राजनीति से ऊपर उठकर ‘परिणाम’ (Results) मांग रहे हैं। बिलासपुर की यह गूंज आने वाले समय में प्रदेश की राजनीति की दिशा तय करने वाली है।

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