अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए न्याय और सुरक्षा: एक संवैधानिक और जीवंत वास्तविकता

रायपुर
रामदास अठावले द्वारा रचित लेख के आधार पर, भारत सरकार अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) के अधिकारों की रक्षा, सामाजिक समानता और न्याय सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। एक न्यायपूर्ण समाज की स्थापना के लिए कानूनी ढांचे को और अधिक सुदृढ़ बनाया गया है।
कानूनी और संस्थागत सुधार
सशक्त कानून: नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 (PCR Act) और एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (PoA Act) इस सुरक्षा के मुख्य आधार हैं।
त्वरित न्याय और अदालतें: अपराधों की त्वरित सुनवाई के लिए देश के 15 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 217 अनन्य विशेष न्यायालय (Exclusive Special Courts) स्थापित किए गए हैं।
कानूनी प्रक्रिया का सरलीकरण: 2018 के संशोधनों के तहत एफआईआर दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच की अनिवार्यता और आरोपी की गिरफ्तारी के लिए पूर्व अनुमति की आवश्यकता को समाप्त कर दिया गया है।
बढ़ी हुई राहत राशि: अत्याचार के 47 विभिन्न अपराधों के लिए राहत राशि में वृद्धि की गई है और पीड़ितों के पुनर्वास को प्राथमिकता दी गई है। सीमावर्ती मामलों में स्पष्टता के लिए यह प्रावधान किया गया है कि राहत राशि उस राज्य द्वारा दी जाएगी जहाँ प्राथमिकी दर्ज हुई है।
सहायता और जागरूकता पहल
‘संबल’ राष्ट्रीय हेल्पलाइन (NHAA): टोल-फ्री नंबर 1800-202-1989 और शॉर्ट कोड 14566 के माध्यम से नागरिक आसानी से जानकारी, मार्गदर्शन और शिकायत निवारण प्राप्त कर सकते हैं।
वित्तीय और सामाजिक सहायता: वर्ष 2014-15 से अब तक 5,012.17 करोड़ रुपये की केंद्रीय सहायता जारी की जा चुकी है, जिससे लगभग 7,26,588 पीड़ितों को राहत और 2,21,716 जोड़ों को अंतरजातीय विवाह के लिए प्रोत्साहन राशि प्रदान की गई है।
सरकार का दृष्टिकोण केवल अत्याचार के बाद प्रतिक्रिया देना नहीं, बल्कि रोकथाम, जागरूकता, संस्थागत जवाबदेही और एक ऐसा सुरक्षित वातावरण तैयार करना है जहाँ हर नागरिक बिना किसी डर के गरिमा के साथ जीवन जी सके। न्याय केवल एक संवैधानिक वादा नहीं, बल्कि एक जीवंत वास्तविकता होना चाहिए