रायपुर: भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (सीएजी) की हालिया रिपोर्ट ने छत्तीसगढ़ की पंचायती राज संस्थाओं (PRI) और शहरी स्थानीय निकायों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मार्च 2023 तक के आंकड़ों पर आधारित यह लेखापरीक्षा रिपोर्ट राज्य में विकेंद्रीकृत शासन व्यवस्था की लचर स्थिति को उजागर करती है।
रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु :
- मानव संसाधन का भारी संकट: पंचायती राज संस्थाओं में स्वीकृत पदों के मुकाबले 61 प्रतिशत पद रिक्त हैं। संचालनालय, जिला और जनपद स्तर पर 2,260 में से केवल 872 पद ही भरे गए हैं। वहीं, ग्राम पंचायत स्तर पर 1,278 सचिवों की कमी के कारण प्रशासनिक और विकासात्मक कार्यों पर बुरा असर पड़ रहा है।
- वित्तीय अनियमितता: राज्य वित्त आयोग की अनुशंसा के बावजूद, स्थानीय निकायों को उनके हक की ₹3,243.46 करोड़ की राशि कम जारी की गई। इसके अतिरिक्त, भू-राजस्व, उपकर और उत्पाद शुल्क जैसे निर्धारित स्रोतों से भी कोई राशि हस्तांतरित नहीं की गई।
- निष्क्रिय ग्राम सभाएं: सीएजी की जांच में शामिल 36 ग्राम पंचायतों में से एक भी ग्राम सभा में आवश्यक गणपूर्ति (कोरम) नहीं पाई गई, जो जमीनी स्तर पर लोकतंत्र की भागीदारी पर बड़ा सवाल है।
- जिला योजना समितियों का अभाव: वर्ष 2018 से 2023 के बीच जिला योजना समितियों की बैठकें नहीं होने से स्थानीय विकास योजनाओं के समन्वित नियोजन का मुख्य उद्देश्य ही विफल हो गया है।
- डिजिटल बाधाएं: ‘ई-ग्राम स्वराज’ पोर्टल होने के बावजूद अधिकांश वित्तीय लेनदेन अभी भी पुरानी मैनुअल नकद प्रणाली से ही हो रहे हैं, जिससे पारदर्शिता का अभाव बना हुआ है।
- शहरी निकायों में भी कुप्रबंधन: नगर निगमों में परियोजनाओं में देरी के बावजूद ठेकेदारों से करोड़ों की क्षतिपूर्ति राशि नहीं वसूली गई और व्यावसायिक परिसरों के आवंटन में देरी से राजस्व का भारी नुकसान हुआ है।
समीक्षा :
सीएजी (CAG) की यह रिपोर्ट छत्तीसगढ़ में स्थानीय निकायों के वित्तीय प्रबंधन, प्रशासनिक क्षमता और संवैधानिक दायित्वों के निर्वहन में बड़ी खामियों की ओर इशारा करती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन रिक्तियों और वित्तीय बाधाओं को जल्द दूर नहीं किया गया, तो राज्य के ग्रामीण और शहरी विकास का एजेंडा गंभीर रूप से प्रभावित हो सकता है।


