Tuesday, June 2, 2026

खोंधरा जंगल बना वन्यजीवों का ‘डेथ जोन’: 9 महीने में 7 चीतलों की मौत, वन विभाग की लापरवाही या शिकारियों से सांठगांठ?

सीपत/बिलासपुर | बिलासपुर वन मंडल के सीपत क्षेत्र अंतर्गत खोंधरा जंगल में वन्यजीवों की सुरक्षा राम भरोसे है। शुक्रवार को बोइर पड़ाव के पास एक और नर चीतल का शव मिलने से हड़कंप मच गया है। पिछले 9 महीनों के भीतर कुत्तों के हमले और संदिग्ध परिस्थितियों में यह 7वें चीतल की मौत है। हैरानी की बात यह है कि जिस सड़क से वन विभाग के अधिकारी दिन-रात गुजरते हैं, वहाँ घंटों तक चीतल का शव पड़ा रहा, लेकिन विभाग को इसकी भनक तक नहीं लगी। पर्यटकों की सूचना के बाद विभाग की नींद टूटी।

कुत्तों का आतंक या ‘जंगलराज’ का खेल?

​प्रारंभिक जांच में मौत का कारण कुत्तों का हमला बताया जा रहा है, लेकिन ग्रामीणों और पशु प्रेमियों के बीच विभागीय कार्यप्रणाली को लेकर भारी आक्रोश है। डेढ़ माह पूर्व सोंठी जंगल में एक गर्भवती मादा चीतल की मौत ने विभाग की पोल खोल दी थी, फिर भी सुरक्षा के कोई पुख्ता इंतजाम नहीं किए गए। सवाल यह उठता है कि क्या वन विभाग केवल पोस्टमार्टम की औपचारिकता निभाने के लिए है?

शिकारियों का ‘सेफ कॉरिडोर’ बना खोंधरा

​सूत्रों की मानें तो खोंधरा का जंगल अब शिकारियों के लिए चारागाह बन चुका है। बिलासपुर, कोरबा और जांजगीर के शिकारी रात के अंधेरे में बंदूकों के साथ बेखौफ घूम रहे हैं। ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि यहाँ ‘ट्रांसफर के बाद भी रसूख’ का खेल चल रहा है। चर्चा है कि वर्षों तक यहाँ जमे रहे एक विवादित डिप्टी रेंजर, जिन पर कई जांचें लंबित हैं, उनके इशारे पर ही वर्तमान नियुक्तियां और गतिविधियां संचालित हो रही हैं। नए डिप्टी रेंजर और बीट गार्डों की फील्ड से नदारदगी शिकारियों के लिए रास्ता साफ कर रही है।

पानी की बूंद-बूंद को तरसते बेजुबान

​सैकड़ों एकड़ में फैले इस जंगल में वन्यजीवों के लिए पानी का घोर संकट है। प्यास बुझाने के लिए चीतल और कोटरी बस्तियों की ओर आने को मजबूर हैं, जहाँ आवारा कुत्ते उन्हें अपना निवाला बना लेते हैं। ग्रामीणों का दावा है कि कई शिकार और मौत की घटनाएं तो सामने ही नहीं आतीं और उन्हें जंगल के भीतर ही ‘दफन’ कर दिया जाता है।

“कुत्तों के हमले से चीतल की मौत की जानकारी मिली है। पानी की समस्या को दूर करने के लिए गड्ढों में जल आपूर्ति और चौकीदारों के माध्यम से विशेष निगरानी के निर्देश दिए गए हैं।”

यशपाल वर्मा, rfo, बिलासपुर

 

तीखे सवाल जो जवाब मांगते हैं:

  • लापरवाही: जिस मार्ग पर अफसरों की आवाजाही है, वहाँ मृत चीतल घंटों तक लावारिस क्यों पड़ा रहा?
  • मिलीभगत: क्या रसूखदार पूर्व अधिकारियों के दखल के कारण नए स्टाफ की सक्रियता शून्य है?
  • इंतजाम: 9 महीने में 7 मौतें होने के बाद भी विभाग अब तक ‘त्वरित प्रयास’ के वादे ही क्यों कर रहा है?
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Bilaspur Bulletin

Editor in chief
Kamal kumar gupta
BJMC ,MJMC, ph,D (per)

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