बिलासपुर | सरकारी सिस्टम में ‘कल करेंगे’ वाली मानसिकता को ठेंगा दिखाते हुए बिलासपुर के तहसीलदार प्रकाश चंद साहू ने एक ऐसी मिसाल पेश की है, जिसकी गूंज पूरे छत्तीसगढ़ में सुनाई दे रही है। महाजनगणना 2027 की तैयारियों के मोर्चे पर जहां बड़े-बड़े जिले अभी जमीन तलाश रहे हैं, वहीं प्रकाश साहू ने अपनी टीम के साथ बिलासपुर ग्रामीण के लक्ष्य को भेदकर प्रदेश में पहला पायदान कब्जा लिया है।
फाइलों की सुस्ती पर भारी पड़ी साहू की ‘प्लानिंग’
जनगणना का काम किसी टेढ़ी खीर से कम नहीं होता। हजारों घरों की मैपिंग और आंकड़ों का जाल अक्सर प्रशासन की रफ्तार रोक देता है। लेकिन प्रकाश चंद साहू ने इसे एक ‘टारगेट मिशन’ की तरह लिया। जब छत्तीसगढ़ के अन्य तहसील दफ्तरों में बैठकों का दौर चल रहा था, तब साहू का मैदानी अमला अपना काम समेट चुका था। यह मुकाम हासिल कर उन्होंने साबित कर दिया कि अगर नेतृत्व में दम हो, तो बिलासपुर का डंका पूरे प्रदेश में बज सकता है।
कलेक्टर का भरोसा और ‘ग्राउंड जीरो’ पर एक्शन
इस कामयाबी की स्क्रिप्ट कलेक्टर संजय अग्रवाल और जनगणना अधिकारी (एडीएम) शिव बेनर्जी के कुशल मार्गदर्शन में लिखी गई। वरिष्ठ अधिकारियों ने बिलासपुर की साख की जिम्मेदारी जिस कंधों पर डाली थी, प्रकाश चंद साहू ने उसे बखूबी निभाया। उन्होंने दफ्तर की चहारदीवारी से बाहर निकलकर ‘ग्राउंड जीरो’ पर मोर्चा संभाला और तकनीकी पेचों को चुटकियों में सुलझाकर डेटा को समय से पहले ‘फ्रीज’ करा दिया।
टीम के ‘कैप्टन’ बनकर जीती बाजी
सूत्र बताते हैं कि इस सफलता का राज डंडा चलाना नहीं, बल्कि टीम को साथ लेकर चलना रहा। तहसीलदार साहू ने सुपरवाइजरों और प्रगणकों के बीच वह तालमेल बिठाया, जो अक्सर प्रशासनिक कार्यों में गायब रहता है। काम के दौरान आने वाली व्यावहारिक दिक्कतों को उन्होंने अपना मानकर दूर किया, जिससे मैदानी अमले ने दोगुनी रफ्तार से काम किया।
प्रशासनिक गलियारों में ‘बिलासपुर मॉडल’ की धमक
राजधानी रायपुर तक अब बिलासपुर की इस उपलब्धि के चर्चे हैं। प्रशासनिक हलकों में प्रकाश साहू की इस कार्यशैली को ‘वर्किंग स्टैंडर्ड’ माना जा रहा है। उच्च अधिकारियों ने उनकी तारीफ करते हुए इसे अनुशासन और कर्तव्यनिष्ठा का सबसे बड़ा उदाहरण बताया है। अब प्रदेश के अन्य जिलों के लिए बिलासपुर की यह रफ्तार एक ‘चैलेंज’ बन गई है।

